मानव

मानवाकांक्षा

मैं इस संसार का कल्याण करना चाहता हूँ,
मैं नव संसार का निर्माण करना चाहता हूँ।
हे ईश्वर, हे निखिल जग के सहारे,
मैं इस भू-लोक को निर्वाण करना चाहता हूँ॥
धरा की आंख से आंसू नहीं अनुराग बरसे,
यहाँ रोते हुए बच्चों के मुख से राग बरसे,
यहाँ डूबे नहीं सूरज कभी नव रश्मियों का,
सकल प्राणी-जगत औरों के हित में शब्द बोले,
लगे आघात भू को गर तो चक्षु-रक्त डोले।
मैं अपने प्राण ईश्वर दान करना चाहता हूँ,
मगर संसार का कल्याण करना चाहता हूँ॥
मैं इस संसार का कल्याण करना चाहता हूँ,
मैं नव संसार का निर्माण करना चाहता हूँ।
हे ईश्वर, हे निखिल जग के सहारे,
मैं इस भू-लोक को नर्वाण करना चाहता हूँ॥
दबे भू-दर्द को मैं अब उजागर कर रहा हूँ,
मैं ईश्वर के प्रणय से ही यह सागर भर रहा हूँ,
यहाँ पशुओं की समझें बात हर मानव दहाड़े,
जगो मानव! कहो - हम ही अमित श्रृंगार जग के,
पकड़ लो हाथ ले जाओ भवाब्धि पार तज के।
मैं धरणी को गरल-अनजान करना चाहता हूँ,
मैं इस संसार का कल्याण करना चाहता हूँ॥
मैं इस संसार का कल्याण करना चाहता हूँ,
मैं नव संसार का निर्माण करना चाहता हूँ।
हे ईश्वर, हे निखिल जग के सहारे,
मैं इस भू-लोक को नर्वाण करना चाहता हूँ॥

मानव उद्देश्य

मानव का उद्देश्य जगत को खुश, त्रुटिरहित, कुरीतिरहित और अंधकाररहित बनाना है जहाँ प्रत्येक प्राणी शांति तथा सुख का अनुभव करे, परन्तु यह तब ही हो सकता है जब प्रत्येक मनुष्य का जीवन सत्य पार आधारित होगा। मानव का कार्य केवल मनुष्यों को सत्य तथा उनके कर्त्तव्यों से परिचित कराना है और धरती पर फैले घृणित कार्य तथा परिस्थितियों को समाप्त करना है।

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